| Paper Title | निराला के काव्य में नारी-जीवन और सामाजिक यथार्थ |
| Author(s) | कृष्णा यादव. |
| Country | India |
| Abstract | सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के काव्य में नारी केवल सौन्दर्य, प्रेम अथवा करुणा की परम्परागत प्रतीक-मूर्ति नहीं है; वह विधवा, गृहिणी, श्रमिक, किसान-बहू, पुत्री, प्रेमिका, सीता और महाशक्ति जैसे अनेक रूपों में उपस्थित होकर आधुनिक भारतीय समाज के वर्गीय, जातिगत, आर्थिक और लैंगिक अंतर्विरोधों को उद्घाटित करती है। प्रस्तुत आलेख का केंद्रीय प्रश्न यह है कि निराला की मानवीय और विद्रोही दृष्टि स्त्री के वास्तविक जीवनानुभव को किस सीमा तक अभिव्यक्ति देती है और कहाँ वह आदर्शीकरण, मौन, देह-केंद्रित सौन्दर्यबोध तथा मिथकीय प्रतीकीकरण की सीमाओं में घिर जाती है। ‘विधवा’, ‘बहू’, ‘तोड़ती पत्थर’, ‘वे किसान की नई बहू की आँखें’, ‘सरोज-स्मृति’, ‘जूही की कली’, ‘पंचवटी-प्रसंग’ और ‘राम की शक्ति-पूजा’ के पाठाधारित विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि निराला ने हिंदी कविता में नारी को निजी करुणा से सामाजिक संरचना, घरेलू परिधि से सार्वजनिक श्रम और निष्क्रिय प्रतीक से नैतिक-आध्यात्मिक शक्ति तक विस्तृत किया। फिर भी उनकी नारी-दृष्टि सर्वत्र समान रूप से मुक्तिकामी नहीं है। उसका महत्त्व इसी द्वंद्व में है कि वह अपने युग की रूढ़ियों का प्रतिरोध करते हुए स्वयं उस युग के कुछ संस्कारों को भी वहन करती है। |
| Keywords | निराला, नारी-जीवन, सामाजिक यथार्थ, स्त्री-स्वाधीनता, श्रमजीवी स्त्री, पितृसत्ता, शक्ति-चेतना। |
| Subject Area | Hindi |
| Issue | Volume 1, Issue 4 (July - August 2025) |
| Published | 2025/07/30 |
| How to Cite | कृष्णा यादव (2025). निराला के काव्य में नारी-जीवन और सामाजिक यथार्थ. Shodh Prabha: A Multidisciplinary Journal, 1(4), 37–44. |
| License |
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