| Paper Title |
कौटिल्य की मण्डल नीति और आधुनिक भू-राजनीति: दक्षिण एशिया के विशेष संदर्भ में |
| Author(s) | संतोष कुमार गौतम, प्रो. (डॉ.) विजय प्रताप मल्ल. |
| Country | India |
| Abstract |
प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में आचार्य कौटिल्य का 'अर्थशास्त्र' यथार्थवादी कूटनीति और राज्यशिल्प (Statecraft) का एक आधारभूत ग्रंथ है। 21वीं सदी की जटिल और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में, विशेषकर दक्षिण एशियाई भू-राजनीति के संदर्भ में, कौटिल्य के राजनीतिक सिद्धांतों की प्रासंगिकता पर नए सिरे से विमर्श प्रारंभ हुआ है। यह शोध पत्र कौटिल्य की 'मण्डल नीति' (राज्यों के वृत्त का सिद्धांत) का आलोचनात्मक और विश्लेषणात्मक अध्ययन करता है तथा इसे आधुनिक दक्षिण एशियाई सामरिक गतिशीलता के परिप्रेक्ष्य में परखता है। मण्डल सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है कि एक विजिगीषु (विजय की इच्छा रखने वाले) राज्य का निकटतम पड़ोसी स्वाभाविक रूप से उसका शत्रु होता है, और शत्रु का शत्रु स्वाभाविक मित्र होता है। यह शोध पत्र इस शास्त्रीय सिद्धांत को भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच मौजूद सामरिक त्रिकोण, सीमा विवादों, और क्षेत्रीय गठबंधन की राजनीति पर लागू करता है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि यद्यपि परमाणु निवारण (Nuclear Deterrence) और गैर-राज्य अभिकर्ताओं (Non-state actors) के उदय ने आधुनिक कूटनीति की प्रकृति को बदल दिया है, फिर भी भौगोलिक नियतिवाद, शक्ति-संतुलन और 'पड़ोसी ही शत्रु' जैसी मण्डल नीति की मूल मान्यताएँ आज भी दक्षिण एशिया की विदेश नीतियों का अदृश्य संचालन कर रही हैं। ऐतिहासिक निरंतरता और आधुनिक भू-राजनीतिक यथार्थवाद के बीच सेतु का निर्माण करते हुए, यह शोध पत्र स्पष्ट करता है कि भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' और 'एक्ट ईस्ट' नीतियां कहीं न कहीं कौटिल्य के षड्गुण्य (छह सूत्रीय विदेश नीति) और मण्डल सिद्धांत का ही आधुनिक और परिष्कृत संस्करण हैं। मुख्य शब्द : कौटिल्य, मण्डल नीति, भू-राजनीति, दक्षिण एशिया, यथार्थवाद, सामरिक संतुलन। |
| Keywords | कौटिल्य, मण्डल नीति, भू-राजनीति, दक्षिण एशिया, यथार्थवाद, सामरिक संतुलन। |
| Subject Area | Political Science |
| Issue | Volume 2, Issue 3 (May - June 2026) |
| Published | 2026/06/30 |
| How to Cite | संतोष कुमार गौतम एवं (डॉ.) विजय प्रताप मल्ल (2026). कौटिल्य की मण्डल नीति और आधुनिक भू-राजनीति: दक्षिण एशिया के विशेष संदर्भ में. Shodh Prabha: A Multidisciplinary Journal, 2(3), 86–92. |
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