| Paper Title | सुमित्रानंदन पंत के काव्य में प्रकृति से मानवतावाद तक की विकास-यात्रा |
| Author(s) | कोमल यादव. |
| Country | India |
| Abstract | सुमित्रानंदन पंत की काव्य-यात्रा को प्रायः आरंभिक प्रकृति-सौन्दर्य, मध्यवर्ती प्रगतिशीलता और उत्तरवर्ती अध्यात्म के पृथक चरणों में बाँटकर देखा गया है। ऐसा विभाजन अध्ययन की सुविधा तो देता है, किंतु उनकी काव्य-चेतना के भीतर सक्रिय निरंतरता को पूरी तरह नहीं पकड़ पाता। प्रस्तुत आलेख की केंद्रीय स्थापना यह है कि पंत के यहाँ प्रकृति से मानवतावाद की ओर गति प्रकृति के परित्याग की नहीं, उसके अर्थ-विस्तार की प्रक्रिया है। आरंभ में प्रकृति कवि के आत्मीय अनुभव, रूप-संवेदना और कल्पना का स्वतंत्र लोक बनती है; ‘परिवर्तन’ में उसी सौन्दर्य-बोध के भीतर क्षय, दुःख और ऐतिहासिक अस्थिरता का प्रवेश होता है; ‘युगान्त’ और ‘ग्राम्या’ से मनुष्य, श्रम, भूख, विषमता और जन-संस्कृति काव्य के केंद्र में आते हैं। बाद की रचनाओं में यह मानवतावाद गांधीवादी नैतिकता, सामाजिक परिवर्तन और आध्यात्मिक-भौतिक समन्वय की आकांक्षा से जुड़ता है। आलेख में ‘मोह’, ‘परिवर्तन’, ‘द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र’, ‘मानव’, ‘ग्राम कवि’, ‘कहारों का रुद्र नृत्य’, ‘महात्मा जी के प्रति’ और ‘कवि कृषक’ सहित अनेक कविताओं का पाठ-आधारित विश्लेषण किया गया है। साथ ही पंत की ग्राम-दृष्टि, अमूर्त मानववाद और स्त्री-चित्रण की सीमाओं पर भी विचार किया गया है। निष्कर्षतः उनकी विकास-यात्रा प्रकृति, मनुष्य और विश्व-चेतना के क्रमशः व्यापक होते संबंध की यात्रा सिद्ध होती है। |
| Keywords | सुमित्रानंदन पंत, प्रकृति-चेतना, सौन्दर्य-बोध, मानवतावाद, ग्राम-जीवन, जन-संस्कृति, नव-मानवता |
| Subject Area | Hindi |
| Issue | Volume 1, Issue 5 (September - October 2025) |
| Published | 2025/09/29 |
| How to Cite | कोमल यादव (2025). सुमित्रानंदन पंत के काव्य में प्रकृति से मानवतावाद तक की विकास-यात्रा. Shodh Prabha: A Multidisciplinary Journal, 1(5), 26–34. |
| License |
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