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Shodh Prabha: A Multidisciplinary Journal

Shodh Prabha: A Multidisciplinary Journal

A National, Peer-reviewed (refereed), Bi-Monthly Journal

  ISSN: 3108-2726 (Online)
ISSN: 3108-2890 (Print)

Call For Papers - Volume 2, Issue 4 (July - August 2026)
Paper Title

नागार्जुन के काव्य में जनचेतना और राजनीतिक प्रतिरोध का स्वर

Author(s)शालिनी यादव.
CountryIndia
Abstract

नागार्जुन आधुनिक हिंदी कविता के उन विरल रचनाकारों में हैं जिनके यहाँ कविता सामाजिक यथार्थ की व्याख्या भर नहीं करती, बल्कि शोषण, असमानता और सत्ता के विरुद्ध जनपक्षीय हस्तक्षेप का माध्यम बन जाती है। प्रस्तुत आलेख का केंद्रीय प्रश्न यह है कि नागार्जुन की कविता में जनचेतना किस प्रकार निर्मित होती है और राजनीतिक प्रतिरोध किन काव्यात्मक उपकरणों के माध्यम से अभिव्यक्ति पाता है। इस प्रश्न की पड़ताल उनकी ‘प्रतिबद्ध’, ‘अकाल और उसके बाद’, ‘प्रेत का बयान’, ‘आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी’, ‘बाकी बच गया अंडा’, ‘मंत्र’, ‘शासन की बंदूक’ और ‘हरिजन-गाथा’ जैसी कविताओं के विश्लेषण द्वारा की गई है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि नागार्जुन के यहाँ जनता कोई अमूर्त राजनीतिक संज्ञा नहीं, बल्कि किसान, मजदूर, भूखा परिवार, दलित समुदाय, निम्न-मध्यवर्गीय कर्मचारी और सत्ता से ठगा हुआ सामान्य नागरिक है। उनका राजनीतिक प्रतिरोध व्यंग्य, लोकभाषा, संवाद, पैरोडी, नाटकीयता, प्रतीक और प्रत्यक्ष संबोधन से निर्मित होता है। यद्यपि उनकी कुछ तात्कालिक राजनीतिक कविताओं में घटनापरकता, सपाट कथन और वैचारिक आवेग की सीमाएँ दिखाई देती हैं, तथापि जनता के अनुभव को कविता के केंद्र में प्रतिष्ठित करने तथा लोकतांत्रिक सत्ता को निरंतर प्रश्नांकित करने में उनका योगदान असाधारण है।

Keywordsनागार्जुन, जनचेतना, राजनीतिक प्रतिरोध, जनकविता, व्यंग्य, सत्ता-विमर्श, सामाजिक यथार्थ।
Subject AreaHindi
Issue Volume 1, Issue 4 (July - August 2025)
Published2025/07/30
How to Cite शालिनी यादव (2025). नागार्जुन के काव्य में जनचेतना और राजनीतिक प्रतिरोध का स्वर. Shodh Prabha: A Multidisciplinary Journal, 1(4), 17–24.
License
Copyright © 2025 The Author(s). This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License (CC BY 4.0).

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