| Paper Title |
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में परम्परागत भारतीय राजनीतिक दर्शन एवं मूल्यों की प्रासंगिकता |
| Author(s) | Pragya Parashar. |
| Country | India |
| Abstract |
दर्शन का अर्थ है जो यथार्थ तत्त्व की अनुभूति कराये अर्थात् जो वस्तु हमारे सामने जैसी दिख रही है, उसके पीछे निहित सत्य का जो उद्घाटन करे, वह दर्शन है और सत्य चूँकि काल परिस्थितियों से सीमित नही होता इसलिए सभी मूल्यों को अपने अंदर समावेशित करने वाला परंपरागत राजनीतिक दर्शन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी आज उतना ही प्रासंगिक है जितना वह पूर्व में था | क्यूंकि आदर्शों की प्रासंगिकता का निर्णय तभी हो जाता है जब उनकी सार्थकता व्यवहार के धरातल पर तय की जा चुकी हो और राजनीतिक मूल्यों और आदर्शों को अपने व्यवहारिक जीवन में अभ्यास करने की परम्परा काफी प्राचीन रही है | क्यूंकि राज्य की स्थापना से पूर्व व्यक्ति प्रशासन से अधिक आत्मानुशासन से नागरिक समाज का सञ्चालन किया करता था | राज्य की आवश्यकता ही तब अनुभव की गयी जब व्यक्ति के नैतिक मूल्यों का अधःपतन हो गया था | इसका प्रमाण मनु एवं कौटिल्य द्वारा वर्णित मत्स्य न्याय की अवधारणा में मिलता है | यह सत्य है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुत्व, अधिकार, मानवीय गरिमा जैसे मूल्यों को ध्यान में रखकर अवसरंचनात्मक विकास को प्रोत्साहन दिया | परन्तु वैश्वीकरण की द्रुत गति में स्वयं को अग्रपंक्ति में रखने की अंधाधुंध दौड़ में मनुष्य की पदलोलुपता एवं अवसरवादिता ने लोकतान्त्रिक संस्थाओं की गरिमा को प्रभावित भी किया है | वर्गीय, जातीय, नस्लीय ,भाषाई , क्षेत्रीय आदि विभिन्न आधारों पर अप्रतिबंधित अधिकारों की मांग करते करते वह कर्तव्यों की तिलांजलि भी दे बैठा है | फलस्वरूप राष्ट्र में हिंसा, चोरी ,लूटपाट, अपराधीकरण, असुरक्षा, असमानता अन्याय एवं भय का वातावरण जन्म लेता है | जब इन समस्याओं का स्थानीय स्तर पर समाधान तंत्र उपलब्ध नही हो पाता तब ये राष्ट्रीय चुनौतियों में परिवर्तित हो जाती है | इसलिए परंपरागत राजनीतिक दर्शन उस लोकतान्त्रिक व्यवस्था में उस सत्ता का प्रतिनिधित्व करने वाली राजशक्ति हो या उस पर संप्रभुता रखने वाली लोकशक्ति हो दोनों को ही संतुलन का सन्देश देता है | परंपरागत राजनीतिक दर्शन मात्र विचार नही देता बल्कि व्यवस्था प्रदान करता है | क्यूंकि वर्तमान समस्या किसी बाहा साम्राज्यवाद की नही बल्कि वैचारिक शिथिलता की है जिसमे सतत निगरानी के अभाव में लोकतान्त्रिक चुनौतियों को जन्म देने का कारक बनती है | इस दिशा में परंपरागत राजनीतिक दर्शन एवं मूल्य आज भी प्रासंगिक है | |
| Keywords | दर्शन, नैतिकता, प्रासंगिकता, मूल्य, न्याय, स्वतंत्रता, बंधुत्व |
| Subject Area | Political Science |
| Issue | Volume 2, Issue 4 (July - August 2026) |
| Published | 2026/08/05 |
| How to Cite | Parashar, P. (2026). वर्तमान परिप्रेक्ष्य में परम्परागत भारतीय राजनीतिक दर्शन एवं मूल्यों की प्रासंगिकता. Shodh Prabha: A Multidisciplinary Journal, 2(4), 77–83. |
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