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Shodh Prabha: A Multidisciplinary Journal

Shodh Prabha: A Multidisciplinary Journal

A National, Peer-reviewed, Bi-Monthly Journal

  ISSN: 3108-2726 (Online)
ISSN: 3108-2890 (Print)

Call For Papers - Volume - 2 Issue - 4 (July - August 2026)
Paper Title

भक्ति कालीन साहित्य और सामाजिक समरसता

Author(s) कोमल यादव.
Country India
Abstract

भक्ति काल भारतीय साहित्य के इतिहास का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण युग है, जिसने सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। इस काल में रचित साहित्य केवल आध्यात्मिक चेतना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, धार्मिक कट्टरता, ऊँच-नीच तथा सामाजिक असमानताओं के विरुद्ध सशक्त आवाज़ उठाई। संत कवियों ने अपने विचारों और रचनाओं के माध्यम से मानवता, प्रेम, समानता तथा भाईचारे का संदेश दिया। कबीर ने जाति-पाँति और धार्मिक पाखंड का विरोध करते हुए मानव धर्म को सर्वोपरि माना, वहीं रैदास ने समतामूलक समाज की कल्पना प्रस्तुत की। गुरु नानक ने धार्मिक सहिष्णुता और मानव सेवा पर बल दिया, जबकि तुलसीदास और सूरदास ने लोकमंगल तथा नैतिक मूल्यों को अपने साहित्य का आधार बनाया। भक्ति कालीन साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसे लोकभाषाओं में रचा गया, जिससे सामान्य जनता तक सामाजिक चेतना का प्रसार संभव हो सका। इस साहित्य ने समाज के निम्न वर्ग, दलितों तथा उपेक्षित समुदायों को नई पहचान और आत्मविश्वास प्रदान किया। भक्ति आंदोलन ने भारतीय समाज में सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्तमान समय में जब समाज अनेक प्रकार के विभाजनों और असहिष्णुता की चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब भक्ति साहित्य के मानवतावादी और समन्वयवादी विचार अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। यह अध्ययन भक्ति कालीन साहित्य के माध्यम से सामाजिक समरसता की अवधारणा तथा उसके सामाजिक प्रभावों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

Subject Area Hindi
Issue Volume 1, Issue 4 (July - August 2025)
Published 2025/07/15
How to Cite कोमल यादव (2025). भक्ति कालीन साहित्य और सामाजिक समरसता. Shodh Prabha: A Multidisciplinary Journal, 1(4), 1–8.

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