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Shodh Prabha: A Multidisciplinary Journal

Shodh Prabha: A Multidisciplinary Journal

A National, Peer-reviewed, Bi-Monthly Journal

  ISSN: 3108-2726 (Online)
ISSN: 3108-2890 (Print)

Call For Papers - Volume - 2 Issue - 4 (July - August 2026)
Paper Title

अवध के ऐतिहासिक परिदृश्य में भर समुदाय की भूमिका: लखनऊ व निकटवर्ती क्षेत्रों का एक ऐतिहासिक अन्वेषण (9वीं से 14वीं सदी तक)

Author(s) Aashish Kumar.
Country India
Abstract

अवध क्षेत्र, विशेषकर लखनऊ और उसके सीमावर्ती जिलों का 9वीं से 14वीं शताब्दी का इतिहास मुख्य रूप से भर राजभर जाति के राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व का काल रहा है। प्रस्तुत शोध पत्र लखनऊ, रायबरेली, बाराबंकी और सम्पूर्ण अवध क्षेत्र में भर जनजाति के ऐतिहासिक विकास, उनके राजनीतिक पतन और उनके पुरातात्विक अवशेषों किलों, टीलों और कोटों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ऐतिहासिक दस्तावेजों, औपनिवेशिक गजेटियरों और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि भर केवल एक वनवासी जनजाति नहीं थे, बल्कि उन्होंने एक सुदृढ़ विकेन्द्रीकृत राज्य प्रणाली की स्थापना की थी। यद्यपि लखनऊ के दक्षिण-पूर्वी भागों और शेष अवध में भरों का व्यापक प्रभाव था, किन्तु लखनऊ के कुछ हिस्सों में पुराने टीलों और किलों को पासी या अरख जातियों से भी जोड़ा जाता है, जो स्वयं को भरों के ही समतुल्य या उनके ही वंशज मानते हैं। इसी प्रकार, रायबरेली और अन्य क्षेत्रों में अहीर और पासी जातियों की लोककथाएं उन्हें भरों का वंशज बताती हैं। 11वीं शताब्दी में तुर्क आक्रमणों विशेषकर सैयद सालार मसूद से लेकर 13वीं-14वीं शताब्दी में बैस और कान्हपुरिया राजपूतों के उदय तक, भरों ने बाहरी शक्तियों का कड़ा प्रतिरोध किया। अंततः 14वीं शताब्दी तक राजपूतों के सैन्य विस्तार और दिल्ली सल्तनत के सुदृढ़ीकरण के कारण भरों की राजनीतिक सत्ता का पतन हो गया। यह शोध पत्र इसी ऐतिहासिक संक्रमण का समग्र मूल्यांकन करता है। मुख्य शब्द: भर जाति, मार्शल रेस, अवध, टीले और कोट, भरडीह, लखनऊ,भरवारा,काकोरी, राजपूत, तुर्क ।

Subject Area History
Issue Volume 2, Issue 1 (January - February 2026)
Published 2026/02/16
How to Cite Kumar, A. (2026). अवध के ऐतिहासिक परिदृश्य में भर समुदाय की भूमिका: लखनऊ व निकटवर्ती क्षेत्रों का एक ऐतिहासिक अन्वेषण (9वीं से 14वीं सदी तक). Shodh Prabha: A Multidisciplinary Journal, 2(1), 27–33.

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